लखनऊ। रायबरेली के एक किसान के लिए सड़क हादसा जिंदगी का सबसे बड़ा दुख लेकर आया। इस दुर्घटना में उनकी सात वर्षीय बेटी की मौत हो गई, जबकि उनका हाथ इतनी गंभीर रूप से घायल हो गया कि कई अस्पतालों में उसे काटने की सलाह दी गई। आखिरकार मोहनलालगंज स्थित सिग्मा हॉस्पिटल एवं ट्रॉमा सेंटर के डॉक्टर सिद्धार्थ पटेल और उनकी टीम ने जटिल सर्जरी कर उनका हाथ बचाने में सफलता हासिल की।
रायबरेली जिले के शिवगढ़ थाना क्षेत्र के केसर खेड़ा गांव निवासी अजय कुमार (35) खेती कर परिवार का भरण-पोषण करते हैं। परिवार में पत्नी प्रिया और तीन बेटियां रिया (14), आस्था (7) और आयुषी (3) हैं। 18 मई को अजय अपनी बेटी आस्था को स्कूल से लेकर बाइक से घर लौट रहे थे। इसी दौरान रास्ते में ट्रक की टक्कर से दोनों हादसे का शिकार हो गए।

हादसे में सात वर्षीय आस्था की मौत हो गई, जबकि अजय गंभीर रूप से घायल हो गए। परिजनों ने उन्हें पहले शिवगढ़ सीएचसी पहुंचाया, जहां से उन्हें पीजीआई के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर रेफर कर दिया गया। परिजनों का कहना है कि वहां हाथ की गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे काटने की सलाह दी गई। बाद में मेदांता अस्पताल में भी उन्हें राहत नहीं मिली।
इसके बाद परिवार अजय को मोहनलालगंज स्थित सिग्मा हॉस्पिटल एवं ट्रॉमा सेंटर लेकर पहुंचा। जांच में पता चला कि हाथ की अल्ना और ह्यूमरस हड्डियां टूट चुकी थीं। हाथ का बड़ा हिस्सा बुरी तरह क्षतिग्रस्त था और उसमें रक्त संचार भी बंद हो चुका था। हादसे के लगभग 12 से 14 घंटे बाद मरीज अस्पताल पहुंचा था।
अस्पताल के आर्थोपेडिक एवं ट्रॉमा विशेषज्ञ डॉ. सिद्धार्थ पटेल ने बताया कि सबसे बड़ी चुनौती हाथ में दोबारा रक्त संचार बहाल करना था। चिकित्सकों ने सबसे पहले क्षतिग्रस्त धमनी की मरम्मत कर रक्त प्रवाह शुरू कराया। इसके बाद टूटी हड्डियों को फिक्स किया गया और क्षतिग्रस्त ऊतकों का उपचार किया गया।
अजय करीब 15 से 20 दिन तक अस्पताल में भर्ती रहे। इस दौरान तीन से चार ऑपरेशन किए गए। संक्रमण और सड़न को रोकने के लिए कई बार डिब्राइडमेंट की प्रक्रिया भी करनी पड़ी। लगातार उपचार और निगरानी के बाद हाथ की स्थिति में सुधार होने लगा।
डॉ. पटेल के अनुसार, यदि समय पर रक्त संचार बहाल नहीं किया जाता तो हाथ बचाना मुश्किल हो सकता था। चिकित्सकीय टीम के प्रयासों से आज मरीज का हाथ सुरक्षित है और उसे काटने की नौबत नहीं आई।
इस हादसे का सबसे भावुक पहलू यह रहा कि अजय अपनी सात वर्षीय बेटी आस्था के अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हो सके। एक ओर परिवार बेटी को खोने के दुख से गुजर रहा था, तो दूसरी ओर अजय अस्पताल में जिंदगी और अपने हाथ को बचाने की लड़ाई लड़ रहे थे।
फिलहाल अजय की हालत में लगातार सुधार हो रहा है। परिवार ने डॉक्टरों और अस्पताल की टीम का आभार जताते हुए कहा कि जब उम्मीद लगभग खत्म हो चुकी थी, तब मोहनलालगंज के डॉक्टरों ने उनके जीवन में नई उम्मीद जगा दी।