लखनऊ । खेतों की मिट्टी को रासायनिक प्रदूषण से बचाने और किसानों को टिकाऊ खेती के प्रति जागरूक करने के लिए गुरुवार को काकोरी ब्लॉक के गोप्रमाऊ गांव में ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत किसान जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसका आयोजन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के राष्ट्रीय मत्स्य आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBFGR), लखनऊ और कृषि विज्ञान केंद्र, भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान (IISR), लखनऊ की ओर से संयुक्त रूप से किया गया।
कार्यक्रम में गोप्रमाऊ और आसपास के गांवों के 50 प्रगतिशील किसानों ने हिस्सा लिया। इनमें 25 महिलाएं और 25 पुरुष शामिल रहे। विशेषज्ञों ने किसानों को बताया कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल मिट्टी की उर्वरता, मानव स्वास्थ्य, जल गुणवत्ता और जैव विविधता को नुकसान पहुंचाता है।
कृषि विज्ञान केंद्र के विषय विशेषज्ञ डॉ. आरपी साहू और फार्म प्रबंधक दीप कुमार ने उन्नत कृषि तकनीकों और संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की जानकारी दी। वहीं, राष्ट्रीय मत्स्य आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो की प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रेखा देवी चक्रवर्ती और वरिष्ठ तकनीकी सहायक डॉ. रंजन सिंह ने फसल उत्पादन के साथ मत्स्य पालन और पशुपालन को जोड़ने के फायदों के बारे में बताया।
विशेषज्ञों ने किसानों को मृदा परीक्षण और एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन के आधार पर जरूरत के मुताबिक ही रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल करने की सलाह दी। उन्होंने खाद्य श्रृंखला में कीटनाशकों के अवशेष पहुंचने और केंचुओं, परागण करने वाले जीवों तथा जलीय जीवों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के बारे में भी जानकारी दी।
डॉ. रेखा देवी चक्रवर्ती ने काकोरी क्षेत्र में मीठे पानी में मत्स्य पालन, तालाब आधारित मछली पालन और मत्स्य पालन के साथ पशुपालन को जोड़ने वाले मॉडल की संभावनाएं बताईं। उन्होंने कहा कि इस तरह की एकीकृत कृषि प्रणाली से पोषक तत्वों का बेहतर पुनर्चक्रण होता है। साथ ही किसानों की अतिरिक्त आमदनी बढ़ाने और खासकर महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए सालभर रोजगार के अवसर पैदा करने में मदद मिल सकती है।